Showing posts with label जीवन. Show all posts
Showing posts with label जीवन. Show all posts

Wednesday, February 26, 2025

अंतर्द्वंद





 मैंने लोगों को समझने के क्रम में,


खुद को हर बार दुःख और अंतर्द्वंद से जूझते पाया है।




Tuesday, January 28, 2025

"इंतज़ार"




“किसी चीज का इंतज़ार


वास्तव में हमारे सहनशीलता की परीक्षा है,


क्योंकि उन क्षणों में हम क्षण – क्षण


मानसिक तौर पर घुल रहे होते हैं।”


****

Sunday, January 26, 2025

"तुम मुझे कभी नहीं जान पाओगे"



 

तुम मुझे कभी नहीं जान पाओगे,

क्योंकि उसके लिए तुम्हें मेरे करीब आना होगा,

और ऐसा कभी नहीं होगा,

क्योंकि मुझे दूर जाने का रोग है!



****



Friday, January 24, 2025

"मैंने देखा है उसे"

 




मैंने देखा उसे आज फ़िर,

कुछ गुम सा खोया हुआ,

बेचैन सा शायद,

मैंने उसे आज फ़िर देखा है लड़ते हुए, जूझते हुए खुद से,

वो आज बिल्कुल भी वो नहीं था जो कभी हुआ करता था,

उमंगों से लबरेज़, हंसो सा चंचल।


आज वो उलझा हुआ सा है कुछ ख्यालों में,

मानों खुद से कुछ पूछ रहा हो,

ख़ुद को ढूँढ रहा हो ख़ुद में,

उसके चेहरे से साफ़ नज़र आता है कि,

वो आज बिल्कुल भी वो नहीं रहा जो कभी हुआ करता था ।


****

स्वीकार्यता




अगर मुक्त होना है बातों से, जज़्बातों से, ग़लतियों से, और विचारों से तो स्वीकार करना सीखिए ;


सीखिए कला ख़ुद की ग़लतियों को स्वीकारने की,क्योंकि जब हम चीजों को बिन तोड़े- मारोड़े स्वीकार करते हैं, तब हम मुक्त हो जाते हैं ख़ुद के अपराध बोध से। हम मुक्त हो जाते हैं उन तमाम विचारों से जिन्हें लेकर मन निरंतर द्वंद्व कि स्थिति में होता है मसलन कि मैंने ऐसा किया ही क्यों? मुझसे भूल कैसे हो गयी? काश मैंने ये नहीं किया होता तो आज कहीं और होता आदि आदि।


चीजों को, ग़लतियों को स्वीकारने के बाद सब स्पष्ट हो जाता है आईने की तरह, जिसमें हम अपने सुधार की छवि को निहार सकते हैं और कर सकते हैं एक नयी शुरुआत भविष्य की, इसीलिए स्वीकारना सीखिए ।


****

तुम किसी से मिलना तो

किसी से मिलो तो ऐसे मिलना की जैसे पहली बार नहीं तीसरी – चौथी बार मिल रहे हो, ऐसे मिलना की उसे लगे कि हम क्या सच में पहली बार ही मिल रहे हैं!...