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Friday, January 24, 2025

"दरख़्तों के साये में"




मैं यही कोई 4-5 साल का था, तब मेरे घर के ठीक सामने एक नीम का पेड़ था, आज भी है, पर वह आज मुझसे काफ़ी बड़ा होगया है – उम्र में और शायद लंबाई में भी। छोटा था तो लगता था पेड़ों के भी कितने मज़े होते होंगे ना ;ना कहीं जाने की झंझट, ना खाना बनाने, कपड़े धुलने की झंझट ; उन्हें तो मम्मी – पापा की डांट भी नहीं सुननी पड़ती, वो तो मुक्त हैं ठण्डी – गर्मी से भी। मेरे उस छोटे से दिमाग़ में इससे और ज़्यादा, और भला सोचा ही क्या जा सकता था। इससे पहले मैं बड़ा हो जाऊँ, चलिए ले चलता हूँ आपको आज से ठीक 15-20 साल पहले जहां हम दोनों अपने बचपन में थे ; मैं और मेरे द्वार पर लगा नीम का एक छोटा सा पौधा।


एक दिन पापा नीम का पौधा लेकर आए मैं बाहर ही मिट्टी के घरौंदे बनाने में मस्त था, मुझे बहुत पसंद था मिट्टी के घर बनाना, आपको भी शायद रहा ही होगा। उनमें बिल्कुल वैसे ही व्यवस्था करना जैसे आज के या तभी के घरों में पायी जाती थी ;मसलन कि हमारे घर में खिड़की होनी चाहिए, दरवाज़ा होना चाहिए और बाहर बैठने के लिए एक बड़ा सा मैदान तो होना ही चाहिए जिसमें मैं और मेरे हमजोली साथी गुल्ली-डंडा, कंचे, और पकड़म-पकड़ाई खेल सकें। कभी – कभी उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है, बचपन में हम कितने कल्पनाशील और उत्साह से लबरेज़ हुआ करते थे, और आज… 

बहरहाल, मैंने पापा से पूछा ये कौन सा पौधा है उन्होंने कहा यह है नीम! मैं उस समय इस नाम से अनजान था मुझे तो ले-देकर आम – जामुन के ही नाम पता थे, वज़ह साफ़ थी क्योंकि उनसे मीठे – मीठे आम और जामुन जो खाने को मिलते थे। मैंने पूछ लिया पापा ये नीम क्या होता है? फ़िर क्या था पापा ने नीम के छोटे से छोटे गुण जैसे ये कि ये, बड़े काम का वृक्ष होता है, ये हमें शुद्ध हवा देने से लेकर औषधीय गुणों का वर्णन, बड़े तफ़सील से किया।

उनका तो कहना था बेटा, ये नीम कई बीमारियों को भी ठीक कर देता है। मैं आश्चर्य की मुद्रा में खड़ा ध्यान से सुन रहा था कुछ बातें समझ आयीं, तो कुछ नीम के पत्तों की तरह सिर के ऊपर से निकल गयीं। पर मेरी बाल बुद्धि ने इतना तो समझ लिया था, कि ये है बड़े काम की चीज। फ़िर महीने साल गुज़रते गए हम दोनों बड़े होने लगे अन्तर सिर्फ़ इतना था, कि मेरी ग्रोथ मेरे चेहरे और अन्य अंगों में आ रहे बदलावों से साफ़ ज़ाहिर हो रही थी, पर उस पौधें में मुझे कुछ अन्तर नहीं समझ आ रहे थे। मैं पढ़ने के लिए हॉस्टल चला गया, जब मैं गर्मियों की छुट्टियों में घर लौटा तो मैंने पाया वो नीम का पौधा अब एक वृक्ष बन चुका था ; मैं कौतूहल से भर उठा उसके करीब गया, शायद मैं अपने बचपन के मित्र से मिलने को इच्छुक था। मैंने देखा उसकी टहनियों को जो अब एक नौजवान की भाँति काफ़ी हृष्ट-पुष्ट हो चुकी थी, उन लंबी – लंबी टहनियों में हरे रंगों से भरी हुई छोटी – छोटी पत्तियाँ मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहीं थीं मानों वो आज भी अपने बचपन के दोस्त को बुला रहीं हों। मैं ख़ुद को रोक न सका और लिपट गया उस नीम के पेड़ से। फिर तो जबतक  मैं घर पर रुका हम दोनों ने खूब साथ में वक्त बिताया, मैंने उन हृष्ट-पुष्ट भुजाओं में झूला डाल लिया, छुट्टियों के वो एक महीने उस झूले, उस ‘दरख्त की छाव’ में हसते – खेलते कब बीत गए पता भी ना लगा और मेरे हॉस्टल जाने का वक्त भी आ गया।


बचपन में लगता था ये नीम का पेड़ कितना खुशनसीब है इसे घर से दूर पढ़ने या काम करने तो नहीं जाना पड़ता ;किंतु, आज 15 वर्षो के बाद उस दोस्त के बारे में मेरा नज़रिया पूर्णतः बदल गया है, आज मैं उसके दर्द को समझ सकता हूँ।  एक ही स्थान पर ठण्डी- गर्मी – बरसात को झेलना कितना कठिन होता होगा, हमने अपने लिए तो ढेरों ताम- झाम कर रखे हैं हमें ठण्ड लगती है तो गर्म मोटे- मोटे लिहाफ़ ओढ़ लेते हैं या जो थोड़ा भी संपन्न हैं, उनके पास हीटर और गीजर जैसे उपकरण हैं जो उन्हें ठण्डी का एहसास तक नहीं होने देते। इसी तरह गर्मी में एयर कंडीशनर, पंखे, कूलर तो बरसात में हम छाता और रेन कोट जैसे तरह – तरह के संसाधनों से ख़ुद का बचाव कर लेते हैं। पर ये पेड़ तो बोल भी नहीं सकते कि उन्हें ठण्ड लग रही या उन्हें पसीना आ रहा है या ये, कि उन्हें कोई बारिश से बचाए। जैसे हम किसी एक जगह पर रहते – रहते या उसे देखते – देखते ऊब जाते हैं शायद इन बेज़ुबान पेड़ों का भी एक ही जगह, वर्षों से, उन्हीं लोगों को रोज़ाना देखते हुए मन ऊब जाता होगा और शायद उनका भी कहीं और, किसी नयी जगह पर, नए – नए लोगों से मिलने का मन होता होगा। पर उनकी शायद नियति है, उसी एक स्थान पर ताउम्र बने रहना, बस चुपचाप देखते रहना पीढ़ियों के बदलने की अनवरत यात्रा को।


दरख़्त – वृक्ष


तफ़सील से – विस्तार से

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"मैंने देखा है उसे"

 




मैंने देखा उसे आज फ़िर,

कुछ गुम सा खोया हुआ,

बेचैन सा शायद,

मैंने उसे आज फ़िर देखा है लड़ते हुए, जूझते हुए खुद से,

वो आज बिल्कुल भी वो नहीं था जो कभी हुआ करता था,

उमंगों से लबरेज़, हंसो सा चंचल।


आज वो उलझा हुआ सा है कुछ ख्यालों में,

मानों खुद से कुछ पूछ रहा हो,

ख़ुद को ढूँढ रहा हो ख़ुद में,

उसके चेहरे से साफ़ नज़र आता है कि,

वो आज बिल्कुल भी वो नहीं रहा जो कभी हुआ करता था ।


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स्वीकार्यता




अगर मुक्त होना है बातों से, जज़्बातों से, ग़लतियों से, और विचारों से तो स्वीकार करना सीखिए ;


सीखिए कला ख़ुद की ग़लतियों को स्वीकारने की,क्योंकि जब हम चीजों को बिन तोड़े- मारोड़े स्वीकार करते हैं, तब हम मुक्त हो जाते हैं ख़ुद के अपराध बोध से। हम मुक्त हो जाते हैं उन तमाम विचारों से जिन्हें लेकर मन निरंतर द्वंद्व कि स्थिति में होता है मसलन कि मैंने ऐसा किया ही क्यों? मुझसे भूल कैसे हो गयी? काश मैंने ये नहीं किया होता तो आज कहीं और होता आदि आदि।


चीजों को, ग़लतियों को स्वीकारने के बाद सब स्पष्ट हो जाता है आईने की तरह, जिसमें हम अपने सुधार की छवि को निहार सकते हैं और कर सकते हैं एक नयी शुरुआत भविष्य की, इसीलिए स्वीकारना सीखिए ।


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जीवन




एक दिन ये पाने ना पाने का सिलसिला टूट जाएगा,


एक दिन सबकुछ, कुछ पलों में रुक जाएगा….


बस इतनी ही यात्रा  है!


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डॉग






कुत्ता भी कितना प्यारा प्राणी है ना! भगवान का बनाया हुआ एक नायाब जानवर जो वफ़ादारी में इंसानो से भी ज़्यादा साफ़ दिल और वफ़ादार है ।

अपने मालिक के आते ही तुरंत दौड़कर उसके इर्द- गिर्द मंडराने लगता है भले ही, उसका मालिक अभी पाँच मिनट पहले ही उससे मिलकर , उसे पुचकार कर गया हो, फिर भी वह निस्वार्थ भाव से उसी अगाध प्रेम भाव से उससे मिलता है। उसे इस बात से बिल्कुल भी फर्क़ नहीं पड़ता कि लोग, घर वाले या कोई बाहर से आया हुआ अतिथि क्या सोचेगा ;वह तो एक छोटे बच्चे की भाँति अपने माता- पिता से लिपट जाना चाहता एक निष्कपट, निश्चल प्रेम के बंधन में जो इस दुनिया और शायद उस दुनिया के परे है।

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तुम किसी से मिलना तो

किसी से मिलो तो ऐसे मिलना की जैसे पहली बार नहीं तीसरी – चौथी बार मिल रहे हो, ऐसे मिलना की उसे लगे कि हम क्या सच में पहली बार ही मिल रहे हैं!...