खुद की खोज : बाह्या जगत से अंतर्जगत की यात्रा हम क्या है? क्यों हैं? ऐसे तमाम प्रश्नों पर कुछ शब्द! स्वागत है आपका विचारों की दुनिया में..
Friday, January 9, 2026
तुम किसी से मिलना तो
Saturday, October 4, 2025
"तुम्हारें जाने के बाद"
Sunday, May 18, 2025
"तुम साहित्य के करीब तो जाओ"
Tuesday, April 15, 2025
कभी - कभी किसी चीज की खोज में
कभी - कभी हम किसी चीज की खोज में इतना दूर निकल
आते हैं कि हम खुद को खो देते हैं,
और तब हमें महसूस होता है कि हम वास्तव में बहुत
दूर निकल आए हैं!
Saturday, March 29, 2025
जहां सारा शहर अपना था और तुम अजनबी थे …
Saturday, March 8, 2025
Happy Women's Day
Thursday, March 6, 2025
"मैं कभी हाँ नहीं कह पाया"
Wednesday, March 5, 2025
"पत्तों का झड़ना"
Tuesday, March 4, 2025
क्यों समझ नहीं पाते..
Wednesday, February 26, 2025
अंतर्द्वंद
Thursday, January 30, 2025
"सफ़र"
जब चलते – चलते
मार्ग के अंत की चिंता ख़त्म हो जाए,
जब किसी गंतव्य तक पहुंचने की बेचैनी न रहे,
जब कहीं पहुंचना है इसलिए न चलना पड़े
बल्कि चलने में ही आनंद आने लगे,
तब समझ लेना आप सिर्फ़ चल नहीं रहे हैं
बल्कि जी रहे हैं अपने सफ़र को, अपनी मंजिल को,
और तब आप पाएंगे कि सफ़र और गंतव्य में
कोई अन्तर शेष नहीं रहा।
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Tuesday, January 28, 2025
"इंतज़ार"
“किसी चीज का इंतज़ार
वास्तव में हमारे सहनशीलता की परीक्षा है,
क्योंकि उन क्षणों में हम क्षण – क्षण
मानसिक तौर पर घुल रहे होते हैं।”
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Sunday, January 26, 2025
"तुम मुझे कभी नहीं जान पाओगे"
Saturday, January 25, 2025
"वो बैठा है"
निर्जन वन में,
किसी पेड़ की छाव में,
बैठा है वो, नितांत अकेला ।
उसके चेहरे पर मंद सी मुस्कान है,
उस मुस्कान में एक सुकून सा है,
अजीब सी मनमोहकता है,
वह बिन वज़ह खींचती है अपनी ओर,
मैं खींचा चला जा रहा हूँ उस सुकून में ,
उस सुकून से उपजे एकान्त में ।
वो बैठा है निर्जन वन में किसी दरख़्त की छाव में,
एकदम अकेला अपने एकान्त में ।
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दरख़्त– पेड़
Friday, January 24, 2025
"दरख़्तों के साये में"
मैं यही कोई 4-5 साल का था, तब मेरे घर के ठीक सामने एक नीम का पेड़ था, आज भी है, पर वह आज मुझसे काफ़ी बड़ा होगया है – उम्र में और शायद लंबाई में भी। छोटा था तो लगता था पेड़ों के भी कितने मज़े होते होंगे ना ;ना कहीं जाने की झंझट, ना खाना बनाने, कपड़े धुलने की झंझट ; उन्हें तो मम्मी – पापा की डांट भी नहीं सुननी पड़ती, वो तो मुक्त हैं ठण्डी – गर्मी से भी। मेरे उस छोटे से दिमाग़ में इससे और ज़्यादा, और भला सोचा ही क्या जा सकता था। इससे पहले मैं बड़ा हो जाऊँ, चलिए ले चलता हूँ आपको आज से ठीक 15-20 साल पहले जहां हम दोनों अपने बचपन में थे ; मैं और मेरे द्वार पर लगा नीम का एक छोटा सा पौधा।
एक दिन पापा नीम का पौधा लेकर आए मैं बाहर ही मिट्टी के घरौंदे बनाने में मस्त था, मुझे बहुत पसंद था मिट्टी के घर बनाना, आपको भी शायद रहा ही होगा। उनमें बिल्कुल वैसे ही व्यवस्था करना जैसे आज के या तभी के घरों में पायी जाती थी ;मसलन कि हमारे घर में खिड़की होनी चाहिए, दरवाज़ा होना चाहिए और बाहर बैठने के लिए एक बड़ा सा मैदान तो होना ही चाहिए जिसमें मैं और मेरे हमजोली साथी गुल्ली-डंडा, कंचे, और पकड़म-पकड़ाई खेल सकें। कभी – कभी उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है, बचपन में हम कितने कल्पनाशील और उत्साह से लबरेज़ हुआ करते थे, और आज…
बहरहाल, मैंने पापा से पूछा ये कौन सा पौधा है उन्होंने कहा यह है नीम! मैं उस समय इस नाम से अनजान था मुझे तो ले-देकर आम – जामुन के ही नाम पता थे, वज़ह साफ़ थी क्योंकि उनसे मीठे – मीठे आम और जामुन जो खाने को मिलते थे। मैंने पूछ लिया पापा ये नीम क्या होता है? फ़िर क्या था पापा ने नीम के छोटे से छोटे गुण जैसे ये कि ये, बड़े काम का वृक्ष होता है, ये हमें शुद्ध हवा देने से लेकर औषधीय गुणों का वर्णन, बड़े तफ़सील से किया।
उनका तो कहना था बेटा, ये नीम कई बीमारियों को भी ठीक कर देता है। मैं आश्चर्य की मुद्रा में खड़ा ध्यान से सुन रहा था कुछ बातें समझ आयीं, तो कुछ नीम के पत्तों की तरह सिर के ऊपर से निकल गयीं। पर मेरी बाल बुद्धि ने इतना तो समझ लिया था, कि ये है बड़े काम की चीज। फ़िर महीने साल गुज़रते गए हम दोनों बड़े होने लगे अन्तर सिर्फ़ इतना था, कि मेरी ग्रोथ मेरे चेहरे और अन्य अंगों में आ रहे बदलावों से साफ़ ज़ाहिर हो रही थी, पर उस पौधें में मुझे कुछ अन्तर नहीं समझ आ रहे थे। मैं पढ़ने के लिए हॉस्टल चला गया, जब मैं गर्मियों की छुट्टियों में घर लौटा तो मैंने पाया वो नीम का पौधा अब एक वृक्ष बन चुका था ; मैं कौतूहल से भर उठा उसके करीब गया, शायद मैं अपने बचपन के मित्र से मिलने को इच्छुक था। मैंने देखा उसकी टहनियों को जो अब एक नौजवान की भाँति काफ़ी हृष्ट-पुष्ट हो चुकी थी, उन लंबी – लंबी टहनियों में हरे रंगों से भरी हुई छोटी – छोटी पत्तियाँ मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहीं थीं मानों वो आज भी अपने बचपन के दोस्त को बुला रहीं हों। मैं ख़ुद को रोक न सका और लिपट गया उस नीम के पेड़ से। फिर तो जबतक मैं घर पर रुका हम दोनों ने खूब साथ में वक्त बिताया, मैंने उन हृष्ट-पुष्ट भुजाओं में झूला डाल लिया, छुट्टियों के वो एक महीने उस झूले, उस ‘दरख्त की छाव’ में हसते – खेलते कब बीत गए पता भी ना लगा और मेरे हॉस्टल जाने का वक्त भी आ गया।
बचपन में लगता था ये नीम का पेड़ कितना खुशनसीब है इसे घर से दूर पढ़ने या काम करने तो नहीं जाना पड़ता ;किंतु, आज 15 वर्षो के बाद उस दोस्त के बारे में मेरा नज़रिया पूर्णतः बदल गया है, आज मैं उसके दर्द को समझ सकता हूँ। एक ही स्थान पर ठण्डी- गर्मी – बरसात को झेलना कितना कठिन होता होगा, हमने अपने लिए तो ढेरों ताम- झाम कर रखे हैं हमें ठण्ड लगती है तो गर्म मोटे- मोटे लिहाफ़ ओढ़ लेते हैं या जो थोड़ा भी संपन्न हैं, उनके पास हीटर और गीजर जैसे उपकरण हैं जो उन्हें ठण्डी का एहसास तक नहीं होने देते। इसी तरह गर्मी में एयर कंडीशनर, पंखे, कूलर तो बरसात में हम छाता और रेन कोट जैसे तरह – तरह के संसाधनों से ख़ुद का बचाव कर लेते हैं। पर ये पेड़ तो बोल भी नहीं सकते कि उन्हें ठण्ड लग रही या उन्हें पसीना आ रहा है या ये, कि उन्हें कोई बारिश से बचाए। जैसे हम किसी एक जगह पर रहते – रहते या उसे देखते – देखते ऊब जाते हैं शायद इन बेज़ुबान पेड़ों का भी एक ही जगह, वर्षों से, उन्हीं लोगों को रोज़ाना देखते हुए मन ऊब जाता होगा और शायद उनका भी कहीं और, किसी नयी जगह पर, नए – नए लोगों से मिलने का मन होता होगा। पर उनकी शायद नियति है, उसी एक स्थान पर ताउम्र बने रहना, बस चुपचाप देखते रहना पीढ़ियों के बदलने की अनवरत यात्रा को।
दरख़्त – वृक्ष
तफ़सील से – विस्तार से
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स्वीकार्यता
अगर मुक्त होना है बातों से, जज़्बातों से, ग़लतियों से, और विचारों से तो स्वीकार करना सीखिए ;
सीखिए कला ख़ुद की ग़लतियों को स्वीकारने की,क्योंकि जब हम चीजों को बिन तोड़े- मारोड़े स्वीकार करते हैं, तब हम मुक्त हो जाते हैं ख़ुद के अपराध बोध से। हम मुक्त हो जाते हैं उन तमाम विचारों से जिन्हें लेकर मन निरंतर द्वंद्व कि स्थिति में होता है मसलन कि मैंने ऐसा किया ही क्यों? मुझसे भूल कैसे हो गयी? काश मैंने ये नहीं किया होता तो आज कहीं और होता आदि आदि।
चीजों को, ग़लतियों को स्वीकारने के बाद सब स्पष्ट हो जाता है आईने की तरह, जिसमें हम अपने सुधार की छवि को निहार सकते हैं और कर सकते हैं एक नयी शुरुआत भविष्य की, इसीलिए स्वीकारना सीखिए ।
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डॉग
सुख
चुप रहना, शांत बैठना,
इस चिंता से मुक्त होकर
कि हम कुछ सोच रहे हैं
यह भी एक सुख है!
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तुम किसी से मिलना तो
किसी से मिलो तो ऐसे मिलना की जैसे पहली बार नहीं तीसरी – चौथी बार मिल रहे हो, ऐसे मिलना की उसे लगे कि हम क्या सच में पहली बार ही मिल रहे हैं!...
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पूस का महीना था हवाओं में सर्द ठंडक कहर बरपा रही थी मानों अपने एक प्रहार से ही हाड़ -मांस को गला देना चाहती हो , समय अभी मुश्किल से शाम के...
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‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ विनोद कुमार शुक्ल की एक ऐसी कृति है जिसमें लेखक ने अलग लेखन शैली का प्रयोग किया है। आरंभ में हो सक...
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हर बात को बात से काटना, हर तर्क को दूसरे तर्क से भिड़ाना उनका मूल्यांकन करना पूरी ताक़त लगा देना अपनी बात को सिद्ध करने के लिए, और अंत में प...








