कभी - कभी हम किसी चीज की खोज में इतना दूर निकल
आते हैं कि हम खुद को खो देते हैं,
और तब हमें महसूस होता है कि हम वास्तव में बहुत
दूर निकल आए हैं!
खुद की खोज : बाह्या जगत से अंतर्जगत की यात्रा हम क्या है? क्यों हैं? ऐसे तमाम प्रश्नों पर कुछ शब्द! स्वागत है आपका विचारों की दुनिया में..
कभी - कभी हम किसी चीज की खोज में इतना दूर निकल
आते हैं कि हम खुद को खो देते हैं,
और तब हमें महसूस होता है कि हम वास्तव में बहुत
दूर निकल आए हैं!
जब चलते – चलते
मार्ग के अंत की चिंता ख़त्म हो जाए,
जब किसी गंतव्य तक पहुंचने की बेचैनी न रहे,
जब कहीं पहुंचना है इसलिए न चलना पड़े
बल्कि चलने में ही आनंद आने लगे,
तब समझ लेना आप सिर्फ़ चल नहीं रहे हैं
बल्कि जी रहे हैं अपने सफ़र को, अपनी मंजिल को,
और तब आप पाएंगे कि सफ़र और गंतव्य में
कोई अन्तर शेष नहीं रहा।
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निर्जन वन में,
किसी पेड़ की छाव में,
बैठा है वो, नितांत अकेला ।
उसके चेहरे पर मंद सी मुस्कान है,
उस मुस्कान में एक सुकून सा है,
अजीब सी मनमोहकता है,
वह बिन वज़ह खींचती है अपनी ओर,
मैं खींचा चला जा रहा हूँ उस सुकून में ,
उस सुकून से उपजे एकान्त में ।
वो बैठा है निर्जन वन में किसी दरख़्त की छाव में,
एकदम अकेला अपने एकान्त में ।
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दरख़्त– पेड़
चुप रहना, शांत बैठना,
इस चिंता से मुक्त होकर
कि हम कुछ सोच रहे हैं
यह भी एक सुख है!
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किसी से मिलो तो ऐसे मिलना की जैसे पहली बार नहीं तीसरी – चौथी बार मिल रहे हो, ऐसे मिलना की उसे लगे कि हम क्या सच में पहली बार ही मिल रहे हैं!...