Sunday, May 18, 2025

"मेरे हिस्से का नहीं है "

मैंने कितनी बार तुमसे कहा है मैं तुम्हें नहीं जानता, मेरे जानने में शायद अब कोई अर्थ नहीं। और सच कहूँ तो मैं अब जानना ही नहीं चाहता। मैं नहीं जानना चाहता वह सब जो घटित हुआ या कभी घटित होगा क्योंकि अब घटनाओं के घटने का कोई अर्थ नहीं रहा । और जब मैं बार - बार अर्थ ना होने की बात करता हूँ तब मेरे नज़रों के सामने कुछ कौंध सा जाता है ; एक अजीब सी धुन्ध का धुँधलका जिसे शायद मैं अच्छे से जानता हूँ, और शायद तुम भी! पर फिर मुझे याद आता कि मेरे जानने में कोई अर्थ नहीं क्योंकि मुझे ठीक -ठीक एहसास है कि यह धुँधलका मेरे हिस्से का नहीं है ।

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/शिवेन्द्र

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तुम किसी से मिलना तो

किसी से मिलो तो ऐसे मिलना की जैसे पहली बार नहीं तीसरी – चौथी बार मिल रहे हो, ऐसे मिलना की उसे लगे कि हम क्या सच में पहली बार ही मिल रहे हैं!...