Friday, January 24, 2025

"ख़ुद से मुलाक़ात"




ना जाने कितने दिन बीत गए, शायद एक अरसा होगया ख़ुद से बात किए हुए! ख़ुद से बात? ह्ह् इसमें कौन सी नयी बात है – हम तो रोज ही खुद से रूबरू होते हैं। होते हैं कि नहीं? अरे बताइए, बताइए भाई साब आप से ही पूछ रहे हैं, होते हैं कि नहीं! अजी होते क्यों नहीं बिल्कुल होते हैं। अभी कल ही तो जब चिंटू ने दो रुपये मांगे थे तब मैंने उस पर विचार किया तो था, कि चिंटू टॉफी के लिए ही पैसे मांग रहा या कुछ और के लिए…. अभी कल ही तो ऑफिस के लिए तैयार होते वक़्त ड्रेस और टाई को लेकर गुत्थम- गुत्था हुई थी; और कल ही तो पिकनिक जाने के लिए मुझमें और वैशू में बहसबाज़ी हो रही थी उसका कहना था कि, हम सब मसूरी चले पर मेरा मन तो हरिद्वार कि उन सुन्दर गलियों, उन गलियों में देश- विदेश से आए हुए भक्तों और पर्यटकों के साथ – साथ गंगा तट पर हो रहे संध्या वंदन के दृश्यों में उलझा हुआ था। अब और इससे ज़्यादा क्या खुद से मुलाकात हो सकती है भला! क्या इसे आप खुद से रूबरू होना कहेंगे? बिल्कुल भी नहीं। ये सब तो आपके सामाजिक प्राणी होने के प्रमाण मात्र हैं। भला आप खुद सोचिए, चिंटू की टॉफी, आपकी ऑफिस की वेषभूषा या फ़िर ये कि पिकनिक के लिये कौन सा स्थान सही रहेगा, आपके आंतरिक जीवन से कैसे जुड़ता है? निःसंदेह इन सबका आपके जीवन में महत्व है किन्तु सिर्फ भौतिक जीवन के लिए।


ख़ुद से मुलाक़ात तो तब होगी, जब आप चुपचाप नितांत अकेले , किसी पेड़ की छाव में बैठकर, जहां सिर्फ़ आप होंगे और आपके साथ होगी चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की कूक, पत्तों की सरसराहट और आपका सृजन करने वाली प्रकृति, तब उन एकान्त के पलों में आप स्वयं के साथ होंगे, अपने विचारों, अपने अंतर्मन, और भावनाओं के साथ होंगे ; और तब इन एकांत में बिताए हुए कुछ क्षणों में आप पाएंगे कि सचमें आज एक अरसे के बाद ख़ुद से मुलाक़ात हुई।


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तुम किसी से मिलना तो

किसी से मिलो तो ऐसे मिलना की जैसे पहली बार नहीं तीसरी – चौथी बार मिल रहे हो, ऐसे मिलना की उसे लगे कि हम क्या सच में पहली बार ही मिल रहे हैं!...